SHIV

Thursday, 5 October 2017

भगवान शिव के माता–पिता कौन !!!

भगवान् शिव को ही इस सृष्टि का आदि और अंतबताया गया है। जिसका मतलब यह की इस सृष्टि को भगवान् शिव ने ही निर्मित किया है और इसका अंत भी स्वयं भगवान् शिव ही करेंगे। आजतकहमने भगवान् शिव से जुड़ी काफी बातों को सुना होगा लेकिन हमने यह नहीं सुना है की भगवान् शिव के पिता कौन थे।
भगवान् शिव से यह सवाल जिज्ञासावश एक ऋषियों के समूह द्वारा किया तो शिव ने इसका उत्तर देते हुये कहा की मेरे पिता ब्रह्मा है। तो रिशोयों ने पूछा की आपके दादा का नाम क्या है तब शिव ने कहा की मेरे दादा विष्णु है। ऋषियों ने एक सवाल और किया की आपके परदादा कौन है तो शिव ने कहा की मेरे परदादा शिव है। इसका मतलब यह है की ब्रह्मा विष्णु और महेश एक ही हैं। ब्रह्मा के पुत्र नारद ने अपने पिता से यही सवाल किया था जिसकी जानकारी श्रीमद्देवीभागवतपुराण में दी गयी है। तो ब्रह्मा ने अपने पुत्र नारद से कहा की शिव के माता प्रकृति स्वरुप दुर्गा है और उनके पिता का काल है। हर हर महादेव

Wednesday, 4 October 2017

अद्भुत शिवलिंग जो जितना जमीन से उपर दिखाई देता है उससे ज्यादा है जमीन में दबा..!!!

मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले के खजुराहो में मतंगेश्वर महादेव का एक ऐसा मंदिर भी है, जहां शिवलिंग 9 फीट जमीन के अंदर और उतना ही बाहर है,ये सुनने में बहुत ही अजीब लगता है पर ये दरहसल में एक दम सत्य है।इस मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण है इसके अंदर स्थित करीब ढाई मीटर ऊंचा शिवलिंग, जिसका व्यास एक मीटर से भी ज्यादा है।इस शिवलिंग के बारे में कहा जाता है कि यह शिवलिंग जितना जमीन से उपर दिखाई देता है, उससे ज्यादा यह जमीन में दबा है कहते हैं कि ये मंदिर केवल आराधना के उद्देश्य से ही नहीं बनवाए गए थे।यहां शिव की पूजा नाम से की जाती है।यहां के लोगों की मान्यता है कि खजुराहो ही वह स्थान है,जहां भगवान शिव का विवाह देवी पार्वती के साथ संपन्न हुआ था।मतंगेश्वर का एक अर्थ प्रेम का देवता भी होता है।
इस मंदिर के बारे में एक पौराणिक कथा है कि भगवान शंकर के पास मरकत मणि थी।जिसे शिव ने पांडवों के भाई युधिष्ठिर को दे दी थी।युधिष्ठिर के पास से वह मणि मतंग ऋषि पर पहुंची और उन्होंने राजा हर्षवर्मन को दे दी।मतंग ऋषि की मणि की वजह से ही इनका नाम मतंगेश्वर महादेव पड़ा, इस मंदिर में 8फीट ऊँचा एक भव्य और विशाल शिवलिंग है, मरकत मणि इस शिवलिंग के नीचे दबी हुई है।शिवलिंग को चमकदार बनाने के लिए इस पत्थर को पॉलिश किया गया है।यहाँ के पुजारी से जब बात आकृ गई तो उन्होंने बताया कि मतंगेश्वर भगवान के शिवलिंग की लंबाई को पर्यटन विभाग के कर्मचारी बकायदा इंच टेप से नापते हैं।जिसके बाद वाकई लंबाई पहले से कुछ ज्यादा मिलती है।खास बात यह है कि शिवलिंग जितना ऊपर की ओर बढ़ता है, ठीक उतना ही नीचे की तरफ भी बढ़ता है।यह चमत्कार देखने लोगों का हुजूम उमड़ता है।
यह प्राचीन मंदिर खजुराहो में बनाया गया सबसे पहला मंदिर है । भक्त लोग हररोज़ इस मंदिर में आते हैं। बाकी मंदिरों की तुलना में इस मंदिर का डिज़ाइन बहंत साधारण है लेकिन फिर भी यह बहुत लोकप्रिय है। हर हर महादेव

Sunday, 17 September 2017

शिव आरती ॐओम जय शिव ओंकारा

शिव आरती कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारं | सदा वसन्तं ह्रदयाविन्दे भंव भवानी सहितं नमामि ॥ जय शिव ओंकारा हर ॐ शिव ओंकारा | ब्रम्हा विष्णु सदाशिव अद्धांगी धारा ॥ ॐ जय शिव ओंकारा...... एकानन चतुरानन पंचांनन राजे | हंसासंन ,गरुड़ासन ,वृषवाहन साजे॥ ॐ जय शिव ओंकारा...... दो भुज चारु चतुर्भज दस भुज अति सोहें | तीनों रुप निरखता त्रिभुवन जन मोहें॥ ॐ जय शिव ओंकारा...... अक्षमाला ,बनमाला ,रुण्ड़मालाधारी | चंदन , मृदमग सोहें, भाले शशिधारी ॥ ॐ जय शिव ओंकारा...... श्वेताम्बर,पीताम्बर, बाघाम्बर अंगें सनकादिक, ब्रम्हादिक ,भूतादिक संगें ॐ जय शिव ओंकारा...... कर के मध्य कमड़ंल चक्र ,त्रिशूल धरता | जगकर्ता, जगभर्ता, जगसंहारकर्ता ॥ ॐ जय शिव ओंकारा...... ब्रम्हा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका | प्रवणाक्षर मध्यें ये तीनों एका ॥ ॐ जय शिव ओंकारा...... काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रम्हचारी | नित उठी भोग लगावत महिमा अति भारी ॥ ॐ जय शिव ओंकारा...... त्रिगुण शिवजी की आरती जो कोई नर गावें | कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावें ॥ ॐ जय शिव ओंकारा..... जय शिव ओंकारा हर ॐ शिव ओंकारा| ब्रम्हा विष्णु सदाशिव अद्धांगी धारा॥ ॐ जय शिव ओंकारा...... हर हर महादेव

Thursday, 14 September 2017

भगवान शिव के अर्द्धनारीश्वर रुप की कथा

अर्द्धनारीश्वर शिव सृष्टि के प्रारंभ में जब ब्रह्माजी द्वारा रची गई मानसिक सृष्टि विस्तार न पा सकी, तब ब्रह्माजी को बहुत दुःख हुआ। उसी समय आकाशवाणी हुई ब्रह्मन्! अब मैथुनी सृष्टि करो। आकाशवाणी सुनकर ब्रह्माजी ने मैथुनी सृष्टि रचने का निश्चय तो कर लिया, किंतु उस समय तक नारियों की उत्पत्ति न होने के कारण वे अपने निश्चय में सफल नहीं हो सके।
तब ब्रह्माजी ने सोचा कि परमेश्वर शिव की कृपा के बिना मैथुनी सृष्टि नहीं हो सकती। अतः वे उन्हें प्रसन्न करने के लिए कठोर तप करने लगे। बहुत दिनों तक ब्रह्माजी अपने हृदय में प्रेमपूर्वक महेश्वर शिव का ध्यान करते रहे। उनके तीव्र तप से प्रसन्न होकर भगवान उमा-महेश्वर ने उन्हें अर्द्धनारीश्वर रूप में दर्शन दिया। महेश्वर शिव ने कहा- पुत्र ब्रह्मा, तुमने प्रजाओं की वृद्धि के लिए जो कठिन तप किया है, उससे मैं परम प्रसन्न हूं। मैं तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी करूंगा। ऐसा कहकर शिवजी ने अपने शरीर के आधे भाग से उमा देवी को अलग कर दिया। ब्रह्मा ने कहा.-एक उचित सृष्टि निर्मित करने में अब तक मैं असफल रहा हूं। मैं अब स्त्री-पुरुष के समागम से मैं प्रजाओं को उत्पन्न कर सृष्टि का विस्तार करना चाहता हूं। परमेश्वरी शिवा ने अपनी भौंहों के मध्य भाग से अपने ही समान कांतिमती एक शक्ति प्रकट की। सृष्टि निर्माण के लिए शिव की वह शक्ति ब्रह्माजी की प्रार्थना के अनुसार दक्षकी पुत्री हो गई। इस प्रकार ब्रह्माजी को उपकृत कर तथा अनुपम शक्ति देकर देवी शिवा महादेव जी के शरीर में प्रविष्ट हो गईं, यही अर्द्धनारीश्वर शिव का रहस्य है और इसी से आगे सृष्टि का संचालन हो पाया, जिसके नियामक शिवशक्ति ही हैं। हर हर महादेव

Thursday, 7 September 2017

शिव और सती विवाह कथा

शिव और सती का विवाह दक्ष प्रजापति की कई पुत्रियां थी। सभी पुत्रियां गुणवती थीं। फिर भी दक्ष के मन में संतोष नहीं था। वे चाहते थे उनके घर में एक ऐसी पुत्री का जन्म हो, जो सर्व शक्तिसंपन्न हो एवं सर्व विजयिनी हो। जिसके कारण दक्ष एक ऐसी हि पुत्री के लिए तप करने लगे। तप करतेकरते अधिक दिन बीत गए, तो भगवती आद्या ने प्रकट होकर कहा, मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हूं। तुम किस कारण वश तप कर रहे हों? दक्ष नें तप करने का कारण बताय तो मां बोली मैं स्वय पुत्री रूप में तुम्हारे यहां जन्म धारण करूंगी। मेरा नाम होगा सती। मैं सती के रूप में जन्म लेकर अपनी लीलाओं का विस्तार करूंगी। फलतः भगवती आद्या ने सती रूप में दक्ष के यहां जन्म लिया। सती दक्ष की सभी पुत्रियों में सबसे अलौकिक थीं। सतीने बाल्य अवस्था में ही कई ऐसे अलौकिक आश्चर्य चलित करने वाले कार्य कर दिखाए थे, जिन्हें देखकर स्वयं दक्ष को भी विस्मयता होती रहती थी। जब सती विवाह योग्य होगई, तो दक्ष को उनके लिए वर की चिंता होने लगी। उन्होंने ब्रह्मा जी से इस विषय में परामर्श किया। ब्रह्मा जी ने कहा, सती आद्या का अवतार हैं। आद्या आदि शक्ति और शिव आदि पुरुष हैं। अतः सती के विवाह के लिए शिव ही योग्य और उचित वर हैं। दक्ष ने ब्रह्मा जी की बात मानकर सती का विवाह भगवान शिव के साथ कर दिया। सती कैलाश में जाकर भगवान शिव के साथ रहने लगीं। भगवान शिव के दक्ष के दामाद थे, किंतु एक ऐसी घटना घटीत होगई जिसके कारण दक्ष के ह्रदय में भगवान शिव के प्रति बैर और विरोध भाव पैदा हो गया। एक बार देवलोक में ब्रह्मा ने धर्म के निरूपण के लिए एक सभा का आयोजन किया था। सभी बड़ेबड़े देवता सभा में एकत्र होगये थे। भगवान शिव भी इस सभा में बैठे थे। सभा मण्डल में दक्ष का आगमन हुआ। दक्ष के आगमन पर सभी देवता उठकर खड़े हो गए, पर भगवान शिव खड़े नहीं हुए। उन्होंने दक्ष को प्रणाम भी नहीं किया। फलतः दक्ष ने अपमान का अनुभव किया। केवल यही नहीं, उनके ह्रदय में भगवान शिव के प्रति ईर्ष्या की आग जल उठी। वे उनसे बदला लेने के लिए समय और अवसर की प्रतीक्षा करने लगे। एक बार सती और शिव कैलाश पर्वत पर बैठे हुए परस्पर वार्तालाप कर रहे थे। उसी समय आकाश मार्ग से कई विमान कनखल कि ओर जाते हुए दिखाई पड़े। सती ने उन विमानों को दिखकर भगवान शिव से पूछा, प्रभो, ये सभी विमान किसके है और कहां जा रहे हैं? भगवान शकंर ने उत्तर दिया आपके पिता ने बहोत बडे यज्ञ का आयोजन किया हैं। समस्त देवता और देवांगनाएं इन विमानों में बैठकर उसी यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए जा रहे हैं। इस पर सती ने दूसरा प्रश्न किया क्या मेरे पिता ने आपको यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए नहीं बुलाया? भगवान शंकर ने उत्तर दिया, आपके पिता मुझसे बैर रखते है, फिर वे मुझे क्यों बुलाने लगे? सती मन ही मन सोचने लगीं फिर बोलीं यज्ञ के इस अवसर पर अवश्य मेरी सभी बहनें आएंगी। उनसे मिले हुए बहुत दिन हो गए। यदि आपकी अनुमति हो, तो मैं भी अपने पिता के घर जाना चाहती हूं। यज्ञ में सम्मिलित हो लूंगी और बहनों से भी मिलने का सुअवसर मिलेगा। भगवान शिव ने उत्तर दिया, इस समय वहां जाना उचित नहीं होगा। आपके पिता मुझसे जलते हैं हो सकता हैं वे आपका भी अपमान करें। बिना बुलाए किसी के घर जाना उचित नहीं होता हैं। इस पर सती ने प्रश्न किया एसा क्युं? भगवान शिव ने उत्तर दिया विवाहिता लड़की को बिना बुलाए पिता के घर नही जाना चाहिए, क्योंकि विवाह हो जाने पर लड़की अपने पति कि हो जाती हैं। पिता के घर से उसका संबंध टूट जाता हैं। लेकिन सती पीहर जाने के लिए हठ करती रहीं। अपनी बात बारबात दोहराती रहीं। उनकी इच्छा देखकर भगवान शिव ने पीहर जाने की अनुमति दे दी। उनके साथ अपना एक गण भी साथ में भेज दिया उस गण का नाम वीरभद्र था। सती वीरभद्र के साथ अपने पिता के घर गईं। घर में सतीसे किसी ने भी प्रेमपूर्वक वार्तालाप नहीं किया। दक्ष ने उन्हें देखकर कहा तुम क्या यहां मेरा अपमान कराने आई हो? अपनी बहनों को तो देखो वे किस प्रकार भांतिभांति के अलंकारों और सुंदर वस्त्रों से सुसज्जित हैं। तुम्हारे शरीर पर मात्र बाघंबर हैं। तुम्हारा पति श्मशानवासी और भूतों का नायक हैं। वह तुम्हें बाघंबर छोड़कर और पहना ही क्या सकता हैं। दक्ष के कथन से सती के ह्रदय में पश्चाताप का सागर उमड़ पड़ा। वे सोचने लगीं उन्होंने यहां आकर अच्छा नहीं किया। भगवान ठीक ही कह रहे थे, बिना बुलाए पिता के घर भी नहीं जाना चाहिए। पर अब क्या हो सकता हैं? अब तो आ ही गई हूं। पिता के कटु और अपमानजनक शब्द सुनकर भी सती मौन रहीं। वे उस यज्ञमंडल में गईं जहां सभी देवता और ॠषिमुनि बैठे थे तथा यज्ञकुण्ड में धूधू करती जलती हुई अग्नि में आहुतियां डाली जा रही थीं। सती ने यज्ञमंडप में सभी देवताओं के तो भाग देखे, किंतु भगवान शिव का भाग नहीं देखा। वे भगवान शिव का भाग न देखकर अपने पिता से बोलीं पितृश्रेष्ठ यज्ञ में तो सबके भाग दिखाई पड़ रहे हैं किंतु कैलाशपति का भाग नहीं हैं। आपने उनका भाग क्यों नहीं रखा? दक्ष ने गर्व से उत्तर दिया मैं तुम्हारे पति शिव को देवता नहीं समझता। वह तो भूतों का स्वामी, नग्न रहने वाला और हड्डियों की माला धारण करने वाला हैं। वह देवताओं की पंक्ति में बैठने योग्य नहीं हैं। उसे कौन भाग देगा ? सती के नेत्र लाल हो उठे। उनकी भौंहे कुटिल हो गईं। उनका मुखमंडल प्रलय के सूर्य की भांति तेजोद्दीप्त हो उठा। उन्होंने पीड़ा से तिलमिलाते हुए कहा ओह मैं इन शब्दों को कैसे सुन रहीं हूं मुझे धिक्कार हैं। देवताओ तुम्हें भी धिक्कार हैं, तुम भी उन कैलाशपति के लिए इन शब्दों को कैसे सुन रहे हो जो मंगल के प्रतीक हैं और जो क्षण मात्र में संपूर्ण सृष्टि को नष्ट करने की शक्ति रखते हैं। वे मेरे स्वामी हैं। नारी के लिए उसका पति ही स्वर्ग होता हैं। जो नारी अपने पति के लिए अपमान जनक शब्दों को सुनती हैं उसे नरक में जाना पड़ता हैं। पृथ्वी सुनो, आकाश सुनो और देवताओं, तुम भी सुनो मेरे पिता ने मेरे स्वामी का अपमान किया हैं। मैं अब एक क्षण भी जीवित रहना नहीं चाहती। सती अपने कथन को समाप्त करती हुई यज्ञ के कुण्ड में कूद पड़ी। जलती हुई आहुतियों के साथ उनका शरीर भी जलने लगा। यज्ञमंडप में खलबली पैदा हो गई, हाहाकार मच गया। देवता उठकर खड़े हो गए। वीरभद्र क्रोध से कांप उटे। वे उछ्लउछलकर यज्ञ का विध्वंस करने लगे। यज्ञमंडप में भगदड़ मच गई। देवता और ॠषिमुनि भाग खड़े हुए। वीरभद्र ने देखते ही देखते दक्ष का मस्तक काटकर फेंक दिया। समाचार भगवान शिव के कानों में भी पड़ा। वे प्रचंड आंधी की भांति कनखल जा पहुंचे। सती के जले हुए शरीर को देखकर भगवान शिव ने अपने आपको भूल गए। सती के प्रेम और उनकी भक्ति ने शंकर के मन को व्याकुल कर दिया। उन शंकर के मन को व्याकुल कर दिया जिन्होंने काम पर भी विजय प्राप्त कि थी और जो सारी सृष्टि को नष्ट करने की क्षमता रखते थे। वे सती के प्रेम में खो गए, बेसुध हो गए । भगवान शिव ने उन्मत कि भांति सती के जले हुए शरीर को कंधे पर रख लिया। वे सभी दिशाओं में भ्रमण करने लगे। शिव और सती के इस अलौकिक प्रेम को देखकर पृथ्वी रुक गई, हवा रूक गई, जल का प्रवाह ठहर गया और रुक गईं देवताओं की सांसे। सृष्टि व्याकुल हो उठी, सृष्टि के प्राणी पुकारने लगे— पाहिमाम पाहिमाम भयानक संकट उपस्थित देखकर सृष्टि के पालक भगवान विष्णु आगे बढ़े। वे भगवान शिव की बेसुधी में अपने चक्र से सती के एकएक अंग को काटकाट कर गिराने लगे। धरती पर इक्यावन स्थानों में सती के अंग कटकटकर गिरे। जब सती के सारे अंग कट कर गिर गए, तो भगवान शिव पुनः अपने आप में आए। जब वे अपने आप में आए, तो पुनः सृष्टि के सारे कार्य चलने लगे। धरती पर जिन इक्यावन स्थानों में सती के अंग कटकटकर गिरे थे, वे ही स्थान आज शक्ति के पीठ स्थान माने जाते हैं। आज भी उन स्थानों में सती का पूजन होता हैं, उपासना होती हैं। हर हर महादेव

शिव –पार्वती विवाह कथा

शिव-पार्वती विवाह जब सती के खुद को योगाग्रि में भस्म कर लेने का समाचार शिवजी के पास पहुंचा। तब शिवजी ने वीरभद्र को भेजा। उन्होंने वहां जाकर यज्ञ विध्वंस कर डाला और सब देवताओं को यथोचित फल दिया। सती ने मरते समय शिव से यह वर मांगा कि हर जन्म में आप ही मेरे पति हों। इसी कारण उन्होंने हिमाचल के घर जाकर पार्वती का जन्म लिया
जब से पार्वती हिमाचल के घर में जन्म तब से उनकेमें सुख और सम्पतियां छा गई। पार्वती जी के आने से पर्वत शोभायमान हो गया। जब नारद जी ने ये सब समाचार सुने तो वे हिमाचल पहुंचे। वहां पहुंचकर वे हिमाचल से मिले और हंसकर बोले तुम्हारी कन्या गुणों की खान है। यह स्वभाव से ही सुन्दर, सुशील और शांत है। यह कन्या सुलक्षणों से सम्पन्न है। यह अपने पति को प्यारी होगी। अब इसमें जो दो चार अवगुण है वे भी सुन लो। गुणहीन, मानहीन, माता-पिता विहीन, उदासीन, लापरवाह। इसका पति नंगा, योगी, जटाधारी और सांपों को गले में धारण करने वाला होगा। यह बात सुनकर पार्वती के माता-पिता चिंतित हो गए। उन्होंने देवर्षि से इसका उपाय पूछा। तब नारद जी बोले जो दोष मैंने बताए मेरे अनुमान से वे सभी शिव में है। अगर शिवजी के साथ विवाह हो जाए तो ये दोष गुण के समान ही हो जाएंगे। यदि तुम्हारी कन्या तप करे तो शिवजी ही इसकी किस्मत बदल सकते हैं। तब यह सुनकर पार्वतीजी की मां विचलित हो गई। उन्होंने पार्वती के पिता से कहा आप अनुकूल घर में ही अपनी पुत्री का विवाह किजिएगा क्योंकि पार्वती मुझे प्राणों से अधिक प्रिय है। पार्वती को देखकर मैंना का गला भर आया। पार्वती ने अपनी मां से कहा मां मुझे एक ब्राहा्रण ने सपने में कहा है कि जो नारदजी ने कहा है तु उसे सत्य समझकर जाकर तप कर। यह तप तेरे लिए दुखों का नाश करने वाला है। उसके बाद माता-पिता को बड़ी खुशी से समझाकर पार्वती तप करने गई। पार्वतीजी ने शिव को पति रूप में पाने के लिए तपस्या आरंभ की। लेकिन शिव को सांसारिक बंधनों में कदापि रुचि नहीं थी, इसलिए पार्वतीजी ने अत्यंत कठोर तपस्या की ताकि शिव प्रसन्न होकर उनसे विवाह कर लें। जब सप्तर्षि सती की परीक्षा लेने गए सप्तर्षि ने पार्वती से जाकर पूछा तुम किस के लिए इतना कठिन तप कर रही हो। तब पार्वती ने सकुचाते हुए कहा आप लोग मेरी मुर्खता को सुनकर हंसेंगें। मैं शिव को अपना पति बनाना चाहती हूं। पार्वती की बात सुनकर सभी ऋषि हंसने लगे और बोले की तुमने उस नारद का उपदेश सुनकर शिव को अपना पति माना है जो सब कुछ चौपट कर देता है। उनकी बातों पर विश्वास करके तुम ऐसा पति चाहती हो जो स्वभाव से ही उदासीन, गुणहीन निर्लज्ज, बुरे वेषवाला , बिना घर बार वाला , नंगा और शरीर पर नागों को धारण करने वाला है।ऐसे वर के मिलने से कहो तुम्हे क्या सुख मिलेगा। अब हमारा कहा मानो हमने तुम्हारे लिए बहुत अच्छा वर चुना है। हमने तुम्हारे लिए जो वर चुना है वह लक्ष्मी का स्वामी और वैकुंठपुरी का रहने वाला है। तब पार्वती उनकी बात सुनकर बोली कहा है कि मेरा हठ भी पर्वत के ही समान मजबूत है। मैं अपना यह जन्म शिव के लिए हार चुकी हूं। मेरी तो करोड़ जन्मों तक यही जिद रहेगी। पार्वती की यह बात सुनकर सभी ऋषि बोले आप माया हैं और शिव भगवान है। आप दोनों समस्त जगत के माता-पिता है। यह कहकर सप्तर्षि पार्वती को प्रणाम करके वहां से चले गए। पार्वतीजी की दृढ़ निष्ठा ने जीत लिया शिवजी का मन वर्षो तपस्या करने के बाद एक दिन पार्वतीजी के पास एक ब्रह्मचारी आया। वह ब्रह्मचारी तपस्विनी पार्वती का अघ्र्य स्वीकार करने से पूर्व बोल उठा - तुम्हारे जैसी सुकुमारी क्या तपस्या के योग्य है? मैंने दीर्घकाल तक तप किया है। चाहो तो मेरा आधा या पूरा तप ले लो, किंतु तुम इतनी कठिन तपस्या मत करो। तुम चाहो तो त्रिभुवन के स्वामी भगवान विष्णु भी..। किंतु पार्वती ने ऐसा उपेक्षा का भाव दिखाया कि ब्रह्मचारी दो क्षण को रुक गया। फिर बोला - योग्य वर में तीन गुण देखे जाते हैं - सौंदर्य, कुलीनता और संपत्ति। इन तीनों में से शिव के पास एक भी नहीं है। नीलकंठ, त्रिलोचन, जटाधारी, विभूति पोते, सांप लपेटे शिव में तुम्हें कहीं सौंदर्य दिखता है? उनकी संपत्ति का तो कहना ही क्या, नग्न रहते हैं। बहुत हुआ तो चर्म(चमड़ा) लपेट लिया। कोई नहीं जानता कि उनकी उत्पत्ति कैसे हुई। ब्रह्मचारी पता नहीं क्या-क्या कहता रहा, किंतु अपने आराध्य की निंदा पार्वती को अच्छी नहीं लगी। अत: वे अन्यत्र जाने को उठ खड़ी हुईं। तब शिव उनकी निष्ठा देख ब्रह्मचारी रूप त्याग प्रकट हुए और उनसे विवाह किया। जहां दृढ़ लगन, कष्ट सहने का साहस और अटूट आत्मविश्वास हो, वहां लक्ष्य की प्राप्ति अवश्य होती है।

Monday, 4 September 2017

शक्तिपीठ स्थापना की पूरी कहानी व तथ्य

ऐसे हुई 51 शक्तिपीठों की स्थापना ब्रह्मा के पुत्र प्रजापति दक्ष की पुत्री सती से भगवान शिव का विवाह हुआ। कुछ समय बाद दक्ष को पूरे ब्रह्माण्ड का अधिपति बना दिया गया। इससे दक्ष में अभिमान आ गया। वह अपने आपको सर्वश्रेष्ठ समझने लगा। एक यज्ञ में भगवान शिव द्वारा खुद को प्रणाम न करने पर दक्ष ने उन्हें अनेक अपशब्द कहे। दक्ष ने शिव को शाप दिया कि उन्हें देव यज्ञ में उनका हिस्सा नहीं मिलेगा। यह सुनकर नंदी ने भी दक्ष को शाप दिया कि जिस मुंह से वह शिव निंदा कर रहा है वह बकरे का हो जाएगा। कुछ समय बाद दक्ष ने एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया। उसमें सभी देवी-देवताओं को बुलाया गया पर अभिमानी दक्ष ने शिव को उस यज्ञ से बहिष्कृत कर दिया। किसी तरह सती को यह पता चला तो उन्होंने शिव से उस यज्ञ में जाने की अनुमति मांगी। पहले तो शिव ने उन्हें समझाया पर जब वे नहीं मानीं तो उन्होंने सती को वहां जाने की अनुमति दे दी। सती अपने पिता के घर पहुंची तो दक्ष ने उनसे आंखें फेर लीं। सती यज्ञ में शिव का भाग न देखकर रूष्ट हो गईं और सभी को बुरा-भला कहने लगीं। यह सुनकर दक्ष ने भी शिव निंदा प्रारम्भ कर दी।यह सुनकर सती को बड़ा दुख हुआ और उन्होंने योगाग्रि से अपने शरीर को भस्म कर दिया। यह देखकर शिव के गणों ने दक्ष यज्ञ पर हमला कर दिया पर देवताओं ने उन्हें वहां से भगा दिया। वे शिव के पास गए और सारी घटना सुना दी। यह सुनकर शिव को बड़ा क्रोध आया। उन्होंने अपनी एक जटा को उखाड़कर जमीन पर मारा जिससे वीरभद्र और महाकाली प्रकट हुए। शिव ने उन दोनों को दक्ष का यज्ञ विध्वंस करने की आज्ञा दी। उन्होंने पल भर में ही दक्ष का यज्ञ विध्वंश कर डाला और वीरभद्र ने दक्ष का सिर काट कर उसे यज्ञ कु ण्ड में फेंक दिया। यह देखकर देवताओं में हडकंप मच गया और उन्होंने शिव स्तुति प्रारम्भ कर दी। उनकी स्तुति उन्होंने सभी को जीवनदान दे दिया और दक्ष के शरीर पर बकरे का सिर लगाकर उसे भी जीवित कर दिया। बाद में शिव की अनुमति से दक्ष ने अपना यज्ञ पूरा किया।अपनी प्रिय पत्नी के शव को लेकर शिव पूरे ब्रह्माण्ड में घूमने लगे। उनके प्रताप से सारी सृष्टि जलने लगी। तब विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के ५1 टुकड़े कर दिए। ये टुकड़े जहां-जहां गिरे वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। तब सती का पूरा शरीर कट कर गिर गया तो भगवान बहुत दुखी हुए और कैलास पर जाकर एकांत में समाधि ले ली।

भगवान शिव के माता–पिता कौन !!!

भगवान् शिव को ही इस सृष्टि का आदि और अंतबताया गया है। जिसका मतलब यह की इस सृष्टि को भगवान् शिव ने ही निर्मित किया है और इसका अंत भी स्वयं भग...